अंत्योदय
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ज्योति शर्मा/सागर । मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के तत्वाधान में पण्डित दीनदयाल जी उपाध्याय जी की जयन्ती पर के अवसर पर सहोद्रा राय शासकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, सागर सभागृह में “अन्त्योदय विचार धारा”विषय पर आधारित जिला स्तरीय व्याख्यान कार्यक्रम संभागीय समन्वयक दिनेश उमरैया की अध्यक्षता एवं माननीय कृष्ण अर्चन दास प्रभु इस्कॉन प्रमुख के मुख्यातिथ्य में सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्यातिथि माननीय कृष्ण अर्चन दास प्रभु इस्कॉन प्रमुख ने अपने उद्बोधन में बताया कि पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचार विश्व परिदृश्य में समता मूलक समाज की स्थापना तथा अंतिम व्यक्ति के कल्याण की संकल्पना को धरातल पर साकार करने वाला है,पण्डित जी का जीवन अनेकों विपदाओं एवं अभावों से होते हुए भी सुचिता पूर्ण व आदर्श स्थापित करने वाला रहा है,युवाओं को पंडित दीनदयाल जी को अवश्य पढ़ना चाहिए उनके द्वारा दिया गए”एकात्म मानव दर्शन”के सिद्धांत से ही विश्व समृद्धि व शांति प्राप्त कर सकता है।

 उन्होंने बताया कि अंत्योदय के विचार को साकार करने के लिए उपाध्याय जी ने आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना पर जोर दिया जिसमें आर्थिक विकास के साथ समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण हो पंडित जी का मानना था कि जिस प्रकार राजनीतिक लोकतंत्र में व्यक्ति को स्वतंत्रता समानता व न्याय से व्यक्तित्व विकास का अवसर मिलता है ठीक उसी प्रकार आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना से अंतिम व्यक्ति को भी कार्य करने का अधिकार मिलेगा । जिस प्रकार राजनीतिक लोकतंत्र का सार मतदान का अधिकार है उसी प्रकार आर्थिक लोकतंत्र का सार प्रत्येक व्यक्ति को कार्य का अधिकार है उसे उसका काम एवं हक मिलना ही चाहिए।

 व्याख्यान कार्यक्रम के मुख्यवक्ता माननीय श्री डॉ आशीष द्विवेदी इंक मीडिया जी ने अन्त्योदय विचार धारा पर आधारित विचार व्यक्त करते हुए बताया की ‘एकात्म मानववाद एवं अंत्योदय’जगतगुरु शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत “अहम् ब्रह्मास्मि” के विचारधारा से प्रेरित होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” की अवधारणा की । एकात्म मानववाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके केंद्र में व्यक्ति, व्यक्ति से जुड़ा हुआ परिवार, परिवार से जुड़ा हुआ समाज,राष्ट्र, विश्व और फिर अनंत ब्रह्मांड समाविष्ट है।सभी एक दूसरे से जुड़कर अपना अस्तित्व रखते हैं वह एक दूसरे के पूरक व स्वाभाविक सहयोगी हैं इनमें परस्पर कोई संघर्ष नहीं है । यदि इनमें आपस में संघर्ष होता है तो संपूर्ण विश्व की जो व्यवस्था है बिगड़ जाएगी इसलिए इन दोनों में सहयोग होना बहुत जरूरी है वही एकात्म मानववाद कहलाता है । जब व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों की तरह राष्ट्र से समाज से परिवार से व्यक्ति से और स्वयं से एकात्म स्थापित कर लेता है तब वही एकात्म मानववाद कहा जाता है,इसमे जाति, संप्रदाय, रंग, धर्म आदि के भेद का कोई स्थान नहीं है व्यक्ति और समाज की एकात्मता का विचार है । “एकात्ममानववाद” दीनदयाल उपाध्याय की राजनीतिक दर्शनशास्त्र की केंद्रवर्ती विचारधारा है। हर नौजवान को शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए, हर नौजवान के हाथ में रोजगार होना चाहिए, हर नौजवान को अपने सपने साकार करने के लिए अवसर होना चाहिए । काम का ग्राफ जितना बढ़ेगा रोजगार की संभावनाएं भी उतनी बढ़ेगी दीनदयाल जी का दूसरा अति महत्वपूर्ण सिद्धांत है “अंत्योदय” यह एक आर्थिक विचारधारा है। अंत्योदय का सरल अर्थ है –“समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय” अर्थात समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े निर्धन लोगों का विकास । दीनदयाल जी ने कहा था “आर्थिक योजनाओं तथा प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीडी पर पहुंचे हुए व्यक्ति से नहीं बल्कि सबसे नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होगा उनका उत्थान करना पड़ेगा”। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचार भारतीय राजनीति के साथ-साथ भारत के एकता व अखंडता तथा सम्पूर्ण समाज के विकास की अवधारणा पर आधारित है उन्होंने भारत के साथ विश्व को एकात्ममानव दर्शन के माध्यम से व्यक्ति,उसका मन,उसकी बुद्धि एवं उसकी चित्त(आत्मा)के संतुष्टि पर आधारित विचार बताया है।पंडित जी ने भारत जैसे महान राष्ट्र को भूमि का टुकड़ा नहीं बल्कि जीता जागता राष्ट्र पुरुष कहा है,उन्होंने केरल के कालीकट के अधिवेशन में अपने विचार व्यक्त करते हुए”एकात्म मानव दर्शन एवं अन्त्योदय “के विचारों के आधार पर राष्ट्र को गति प्रदान करने का मंत्र दिया था।पूंजीवादी व समाजवादी विचार धाराओं से ऊपर एकात्मता वादी विचार”एकात्म मानव दर्शन-अन्त्योदय “का विचार दिया और जनसंघ के संस्थापक व अध्यक्ष श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी ने उनके विचारों और व्यक्तिव व कृतित्व को देखने हुए कहा था कि यदि मुझे पंडित दीनदयाल जी जैसे एक और दीनदयाल जी मिल जाएं तो मैं भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदल दूंगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से लेकर जनसंघ के महा सचिव तक का उनका जीवन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पलों में गिना जाता है उनके विचार”सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे संतु निरामया:”के हैं विश्व बंधुत्व के साथ विश्व कल्याण की संकल्पना को घनीभूत करने वाले हैं।श्री द्विवेदी जी ने ऐसे व्याख्यान कार्यक्रमों के आयोजन एवं युवाओं को उनको सुनने,समझने हेतु किये जाने वाले प्रभावी कार्यक्रमों के लिए मध्यप्रदेश जनअभियान परिषद की प्रसंशा की और धन्यवाद दिया।

    कार्यक्रम का शुभारंभ पंडित दीनदयाल जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन एवं माल्यार्पण तथा सरस्वती बंदना एवं स्वागत गीत के साथ किया गया।व्याख्यान कार्यक्रम की प्रस्तावना व अतिथियों के स्वागत उद्बोधन करते हुए जनअभियान परिषद के जिला समन्वयक के के मिश्रा ने बताया कि परिषद द्वारा वर्ष में स्वामी विवेकानंद जी, डॉ. बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर जी,भगवान आदि शंकराचार्य जी, एवं महर्षि श्री अरविंद घोष जी की जयन्ती के साथ 25 सितम्बर को प्रतिवर्ष पण्डित दीनदयाल जी की जयंती पर जिलास्तरीय व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है,उसी क्रम में आज का व्याख्यान आयोजित है अपने उद्बोधन में उन्होंने ने बताया पंडित जी का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के छोटे से गांव नगला चंद्रभान में मध्यमवर्गीय लेकिन प्रतिष्ठित परिवार में हुआ हुआ था । दादा ज्योतिष पिताजी सहायक स्टेशन मास्टर धार्मिक विचारों का प्रवाह पहले से ही परिवार में था वे बेहद सरल स्वभाव के थे । लेकिन बचपन में कुदरत ने करारा प्रहार किया था उनकी 3 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया परिवार नाना के घर चला गया कुछ ही दिनों में दो बच्चों को छोड़कर इनकी मां का स्वर्ग सिधार गईं । उनका और उनके छोटे भाई का लालन-पालन मामा के द्वारा किया गया था । 

संघर्षों के बाद भी दीनदयाल उपाध्याय जी बचपन से ही बहुत ही होनहार बालक थे और उन्होंने 10वीं और 12वीं परीक्षा में अपने विद्यालय में स्वर्ण पदक प्राप्त किया था । मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम आने पर इन्हें राजा कल्याण सिंह की ओर से मासिक छात्रवृत्ति और स्वर्ण पदक दिया गया । राजस्थान राज्य की स्कूली शिक्षा प्राप्त की प्राप्त के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित सनातन धर्म कॉलेज में बी.ए.किया फिर एम.ए. करने आगरा चले गए । जिस वक्त दीनदयाल उपाध्याय अपनी स्नातकोत्तर की शिक्षा ले रहे थे उस वक्त उनकी चचेरी बहन का निधन हो गया जिसके कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी । सिविल सेवा की परीक्षा पास की किन्तु अंग्रेज सरकार की नौकरी नहीं की जन सेवा के लिए उन्होंने उसे त्याग दिया था। 

सन 1937 में श्री बलवंत महाशब्दे के द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जुड़े । उन्होंने 21 जुलाई 1942 लखीमपुर खीरी से अपने मामा जी को एक पत्र लिखा 

“जब किसी मनुष्य को किसी अंग में लकवा मार जाता है तो वह चेतना शून्य हो जाता है इसी भांति हमारे समाज को लकवा मार गया है उसको कोई कितना भी कष्ट क्यों ना दे पर महसूस ही नहीं होता । हर एक तभी महसूस करता है जब चोट उसके सिर पर आकर पड़ती है हमारे पतन का कारण हम में संगठन की कमी ही है बाकी बुराइयां अशिक्षा आदि तो पतित अवस्था के लक्षण मात्र ही हैं इसलिए संगठन करना ही संघ का ध्येय है इसके अतिरिक्त और वह कुछ भी नहीं करना चाहता है । परमात्मा ने हम लोगों को सब प्रकार समर्थ बनाया है क्या फिर हम अपने में से एक को भी देश के लिए नहीं दे सकते है? आपने मुझे शिक्षा दीक्षा देकर सब प्रकार से योग्य बनाया क्या अब मुझे समाज के लिए नहीं दे सकते हैं? जिस समाज के हम उतने ही ऋणी हैं वह तो एक प्रकार से त्याग भी नहीं है। विनियोग है समाज रूपी भूमि में खाद देना है।”

वे संघ के प्रचारक बन गए फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक भाव से संघ का संगठन कार्य करने लगे व्यक्ति के रूप में संघ की विचारधारा को प्रसारित करने लगे।आप जनसंघ के महासचिव बने।

   पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी की मृत्यु 11 फरवरी 1968 को रेलयात्रा के दौरान संदेहास्पद परिस्थिति मे हो गई,लखनऊ से पटना की रेल यात्रा उनकी अंतिम यात्रा थी उनके दुखद निधन से देशभर मे शोक की लहर दौड़ गई । इस सदमे से उबरने में लम्बा समय लगा पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग हमेशा समाज के लिए अमर रहेंगे । कार्यक्रम का संचालन शिक्षाविद् सहित्याकार आचार्य पं. महेशदत्त त्रिपाठी ने किया। ,आभार जिला समन्वयक के के मिश्रा द्वारा किया गया व्याख्यान कार्यक्रम में जिले भर के गणमान्य जन, सामाजिक ,धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि,मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व विकास पाठ्यक्रम के परामर्शदाता,छात्र-छात्राएं एवं नवांकुर व प्रस्फुटन समितियों के प्रतिनिधियों की प्रभावी सहभागिता रही।


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