1936 ओलंपिक में हिटलर के द्वारा दिये गये सैना में बड़े पद को ठुकराकर ध्यानचंद्र ने भारत से ही हॉकी खेलकर देशभक्ति का परिचय दिया : जिला खेल अधिकारी प्रदीप अबिद्रा
सागरI शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर स्वामी विवेकानंद कॅरियर मार्गदर्शन योजना के अंतर्गत व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जिला खेल अधिकारी प्रदीप अबिद्रा, विशिष्ट अतिथि नितिन शर्मा जनभागीदारी अध्यक्ष तथा अध्यक्षता डॉ. सरोज गुप्ता प्राचार्य ने की।
खेल अधिकारी ने कहा कि हॉकी के जादूगर ध्यानचंद्र के जन्म दिन को हम राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में बनाते है। 1928 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक नीदरलैंड्स के एम्स्टर्डम में खेला गया। इस ओलंपिक की विशेषता यह थी कि इंग्लेण्ड भारत से हॉकी में हार न जाये इस लिये इंग्लेण्ड की हॉकी टीन ने भाग ही नहीं लिया और उनका अंदाजा सही था क्योंकि भारत ने इस ओलंपिक में मेजर ध्यानचंद्र के शानदार प्रदर्शन में भारत ने नीदरलैंड्स को 3-0 से पराजित किया।
टूर्नामेंट में ध्यानचंद्र ने 29 में से 14 गोल किये। मैंच के बाद ध्यानचंद्र ने कहा था कि मैं बीमार था और मेरे शरीर का तापमान बहुत अधिक था मैं पेसे से एक सैनिक था और जब देश का संम्मान दाव पर था तब साहस के साथ उतरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। इसी प्रकार 1936 में बर्लिन में खेले गये ओलंपिक के पूर्व जर्मन तानाशाह हिट्लर ने ध्यानचंद्र को जर्मन फौज में बहुत बड़े पद का ऑफर दिया था और कहा था कि तुम जर्मनी की तरफ से ओलंपिक में हॉकी खेलो लेकिन राष्ट्र भक्त ध्यानचंद्र ने भारत में लांसनायक जैसे छोटे पद पर रहना स्वीकार किया और उन्होने भारत के लिए ही हॉकी खेली।
प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने कहा कि ध्यानचंद्र वास्तव में भारत की अनमोल धरोहर है। वे भारतीय हॉकी के पर्याय है। भारत में 1928 से लगातार छः आलंपिक में हॉकी ने स्वर्ण पदक प्राप्त किया। जिसमें सबसे अधिक योगदान मेजर ध्यानचंद्र का था। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अमर कुमार जैन, जिला नोडल अधिकारी, स्वामी विवेकानंद कॅरियर योजना मार्गदर्शन योजना तथा आभार डॉ. प्रतिभा जैन टीपीओ ने किया। कार्यक्रम में विद्यार्थी शामिल थे।
