सागर I भगवान शिव की दो स्वरूपों में पूजा की जाती है। पहली मानव स्वरूप में दूसरी लिंग के स्वरूप पूजा की जाती है। यह प्रायः निर्विवाद है की शिवलिंग पूजा का विकास शिष्नु पूजा से हुआ है। आदिम युग में मनुष्य शिष्नु की पूजा प्रजनन शक्ति के प्रतीक के रूप में करता था। शिष्नु पूजा संसार की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में प्रचलित थी। भारतीय सभ्यता में इसका प्रमाण सिन्ध की अवशेषों में मिलता है।
प्रतिमाशास्त्रीय ग्रन्थों के विवरण के आधार पर गोपीनाथ राव ने निष्कल, सकल तथा मिश्रित प्रकार में लिंग रूप को विभाजित किया है। स्थिरता और सरलता के आधार पर लिंग को चल और अचल प्रकार में विभक्त किया गया है। पुनः निर्माण पदार्थों के आधार पर इन्हीं 6 प्रकारों में बांटा गया है-
मिट्टी के द्वारा निर्मित शिवलिंग, धातुओ के द्वारा निर्मित शिवलिंग, रत्नों के द्वारा निर्मित शिवलिंग, काष्ठ द्वारा निर्मित शिवलिंग, पत्थरों द्वारा निर्मित शिवलिंग, बालू, पुष्प, चावल, चंदन, रुद्राक्ष आदि द्वारा निर्मित शिवलिंग। लिंग के अंतर्गत शिव के एक मुख से लेकर पांच मुखो तक का चित्रण किया गया है और लिंग के इस स्वरूप को मुख्य लिंग की संज्ञा में अभिहित किया जाता था। शिव की एक मुखी तथा पंचमुखी लिंग प्रतिमा का उल्लेख जितेंद्र नाथ बनर्जी ने किया था।
जिला पुरातत्व संग्रहालय सागर में एक मुखी शिवलिंग प्रदर्शित है। यह एक मुखी शिवलिंग 11 वीं शताब्दी का है, जो मढ़पिपरिया से प्राप्त हुआ है। इस शिवलिंग में भगवान शिव का एक मुख लगा हुआ है।
इस शिवलिंग को प्रतिमाशास्त्रीग्रन्थों के अनुसार निर्माण किया गया है। लिंग की संरचना तथा स्वरूप के संबंध में अनेक विवरण प्राप्त होते हैं। विष्णुधर्मोत्तर के अनुसार लिंग की तीन प्रमुख भाग होते हैं। जो इस शिवलिंग में देखे जा सकते हैं। प्रथम भोग पीठ, द्वितीय भद्रपीठ, तृतीय ब्रह्मपीठ। शिवलिंग का ऊपरी वृताकार हिस्सा भोगपीठ, बीच का भाग भद्रपीठ, नीचे का भाग ब्रह्मपीठ होता है। भगवान शिव का यह एक मुखी शिवलिंग विशेष दर्शनीय है।
