सामाजिक समरसता के संदेश वाहक थे महामति प्राणनाथ- प्रो बी के श्रीवास्तव
सागर। श्री कृष्ण प्रणामी स्वाध्याय पीठ एवं इतिहास भाग डॉक्टर हीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के तत्वाधान में 1 अक्टूबर को श्री महामति प्राणनाथ प्राकट्य महोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर ए डी शर्मा, मुख्य अतिथि प्रणामी पीठ पोंडी हटा के महंत श्री बलराम सागर जी, मुख्य वक्ता इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर बी.के. श्रीवास्तव,विशिष्ट वक्ता डॉ पवन खटीक रहे।
प्रो बी के श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्री कृष्ण से संकल्प, अंश, ज्योति, आवेश, एवं बुद्धि प्राप्त कर प्रगटे महामति प्राणनाथ सर्वधर्म समभाव के संदेशवाहक थे। उन्होंने हरिद्वार में सभी धर्मों के आचार्यों के साथ शास्त्रार्थ किया और उसमें विजयी होने पर विजयाभिनंद बुद्ध निष्कलंकावतार की उपाधि ग्रहण की। उन्होंने विश्व के सभी धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया। श्रीमद् भागवत गीता, कुरान बाइबल, गुरु ग्रंथ साहिब में समानता के तत्वों को सामने लाकर सभी धर्मों के अनुयायियों को संदेश दिया कि सभी धर्मों का सार एक है। मानवता के कल्याणार्थ सब प्रेम से रहें, हिल-मिलकर रहें यह उपदेश उन्होंने दिया। महाराजा छत्रसाल के अभ्युदय में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

छत्रपति शिवाजी से आशीर्वाद प्राप्त कर उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते हुए छत्रसाल ने बुंदेलखंड में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की परंतु अभी भी वे धन की कमी से जूझ रहे थे । जब स्वामी प्राणनाथ जी से भेंट हुई तब उन्होंने उनको अपना आध्यात्मिक गुरु मान लिया,इसी आध्यात्मिकता का परिणाम था कि उन्हें स्वामी प्राणनाथ ने इन शब्दों में आशीर्वाद दिया
‘करो राज छत्रसाल मही को।
रण में होय सदा जय टीको।
यह मही तुम्हें दई नूरानी ।
यहां प्रगटि हीरन की खानी। ‘
इस तरह महामति प्राणनाथ ने छत्रसाल को पन्ना को राजधानी बनाने हेतु कहा और बताया कि यहां प्रकट होने वाली हीरों की खानों से तुम्हारी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। यह सत्य साबित हुआ और पन्ना को राजधानी बनाकर छत्रसाल ने अखिल बुंदेला साम्राज्य की स्थापना की। साथ ही उनके ग्रंथ ‘बीतक’ में वर्णित छत्रसाल व औरगंजेब के मध्य हुये पत्रव्यवहार का भी जिक्र किया, जिसमें महाराजा छत्रसाल ने श्री महामति प्राणनाथ जी को पैगंबर का अवतार बताया है। उनकी आध्यात्मिकता एवं भौतिकता के सफल संयोजन की धाक समस्त भारतवर्ष में फ़ैल गई। इससे जीवन में आध्यात्मिकता एवं गुरु के महत्व को समझा जा सकता है।
अकादमिक स्तर पर महामति के अध्ययन और उनके संदेशों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। उन्होंने विभिन्न धर्मो के बीच सेतु का कार्य किया।
डॉ पवन खटीक ने कहा कि गुरु देवचंद जी ने बीज रूप में जो ज्ञान प्राप्त किया उसे महामति प्राणनाथ ने पुष्पित और पल्लवित किया। महामति प्राणनाथ ने पंचकोषों की स्वीकार्यता को माना । उन्होंने कभी किसी धर्म की निंदा नहीं की।
मुख्य अतिथि महाराज बलराम सागर जी ने कहा कि अगर संत ना होते तो यह संसार रागऔर द्वेष की अग्नि में जल जाता । संसार को सुख पहुंचाने और शीतलता प्रदान करने का कार्य महामति प्राणनाथ ने किया। महाराजा छत्रसाल की उन्नति और प्रतिष्ठा में महामति का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने महामति प्राणनाथ के स्वलीला अद्वैत दर्शन पर भी प्रकाश डाला।
प्रो ए डी शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि समय की मांग को पूरा करने के लिए आए हुए प्रज्ञा अवतार थे महामति प्राणनाथ। धर्म के बीच एकता के आधारभूत तत्वों को तलाशने का कार्य उन्होंने किया। वर्तमान में बहु धार्मिक नैतिकता की आवश्यकता है और इस आवश्यकता को महामति प्राणनाथ ने कई सौ वर्ष पहले पूर्ण किया था । वर्तमान में प्रचलित भारतीय ज्ञान परंपरा के शलाका पुरुष थे महामति प्राणनाथ।आज आवश्यकता है, महामति प्राणनाथ जी के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की, जिस हेतु विश्वविद्यालय में स्थापित श्रीकृष्ण स्वाध्याय प्रणामी पीठ लगातार प्रयत्नशील है साथ ही शिक्षकों, शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं से आग्रह किया कि वे श्री महामति प्राणनाथ जी के ग्रंथों का अध्ययन करें व उनके विचारों की प्रासंगिकता को समझें।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ आशुतोष मिश्र ने किया आभार डॉक्टर ननिहाल गौतम ने दिया एवं कार्यक्रम का सफल संयोजन अदिति सिंह बुंदेला द्वारा किया गया।
इस अवसर पर सागर-दमोह क्षेत्र के प्रणामी अनुयायी महादेव प्रसाद अहिरवार,श्रीमती पूजा प्रणामी आदि सहित प्रो अनुपम शर्मा , प्रो नागेश दुबे,डॉ. अनिल तिवारी, डॉ. पंकज सिंह,डॉ. संजय बारोलिया,डॉ. संजय कुमार,डॉ. सुरेन्द्र यादव,डॉ. सत्य नारायण देवलिया, डॉ. नरेन्द्र बौद्ध ,डॉ. मशकूर अहमद,
डॉ. दीपक मोदी सहित भारी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।